भाषा कमजोर नहीं होती, कमजोर होते हैं उसके प्रयोक्ता : प्रो. पांडे
हरिद्वार। हिंदी को केवल संवाद का माध्यम मानना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देना है। हिंदी में भारतीय समाज की स्मृतियां, संवेदनाएं, संघर्ष, संस्कृति और जीवन-दर्शन समाहित हैं। जब यही हिंदी भारतीय सीमाओं को पार कर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचती है तो वह अपने साथ भारत की सांस्कृतिक पहचान भी लेकर जाती…

