Home » नेशनल » भाषा कमजोर नहीं होती, कमजोर होते हैं उसके प्रयोक्ता : प्रो. पांडे

भाषा कमजोर नहीं होती, कमजोर होते हैं उसके प्रयोक्ता : प्रो. पांडे

Share This Article

हरिद्वार। हिंदी को केवल संवाद का माध्यम मानना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देना है। हिंदी में भारतीय समाज की स्मृतियां, संवेदनाएं, संघर्ष, संस्कृति और जीवन-दर्शन समाहित हैं। जब यही हिंदी भारतीय सीमाओं को पार कर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचती है तो वह अपने साथ भारत की सांस्कृतिक पहचान भी लेकर जाती है। हिंदी की इसी वैश्विक यात्रा और बदलते स्वरूप पर सोमवार को उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित राष्ट्रीय व्याख्यान में विस्तार से मंथन हुआ।
14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित ऑनलाइन राष्ट्रीय व्याख्यानमाला में कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कोच्चि के पूर्व कुलपति प्रो. शशिधरन ने ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हिंदी अब भारतीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विश्व में एक प्रमुख संवाद भाषा के रूप में अपनी जगह बना रही है। इस वैश्विक विस्तार में प्रवासी भारतीयों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी जब सीमाओं को पार करती है तो वह भारतीय संस्कृति की ब्रांड एंबेसडर बनकर पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है।
प्रो. शशिधरन ने हिंदी के विस्तार के साथ उसके साहित्यिक पक्ष को मजबूत किए जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि हिंदी को केवल बोलना और समझना ही पर्याप्त नहीं है। भाषा की वास्तविक शक्ति उसके समृद्ध साहित्य में होती है। इसलिए युवाओं को हिंदी में विश्वस्तरीय साहित्य के सृजन के लिए आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदी को वर्तमान मुकाम तक पहुंचाने में साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है और आने वाली पीढ़ी को इस परंपरा को आगे बढ़ाना होगा।
उन्होंने भाषा के भावनात्मक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। उसमें मां की लोरियां, धरती की पीड़ा, बचपन की स्मृतियां और जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव बसते हैं। हिंदी में तुलसी की रामवाणी, प्रेमचंद की संवेदना, कबीर का फक्कड़पन और निराला के विद्रोह की अनुगूंज सुनाई देती है। यही कारण है कि हिंदी को केवल भारत की एक भाषा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वह भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति भी है।
वैश्विक स्तर पर हिंदी की यात्रा को लेकर उन्होंने कहा कि इसके पीछे लंबे समय से चल रहा प्रयास और प्रवासी भारतीयों की पीढ़ियों का योगदान है। विदेशों में रह रही प्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ियां भी भाषा को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि भाषा कभी अपने आप नहीं मरती, बल्कि उसका भविष्य उसके बोलने और प्रयोग करने वालों पर निर्भर करता है। ऐसे में घर को भाषा का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बताते हुए उन्होंने परिवार में भाषा के प्रयोग को महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे ने हिंदी के भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि हिंदी लगातार नए आयाम छू रही है और इसका भविष्य उज्ज्वल है। उन्होंने भाषा के प्रति समाज की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा कि कोई भी भाषा कमजोर नहीं होती, बल्कि उसका प्रयोक्ता कमजोर होता है। इसलिए भारतीयों को हिंदी में संवाद करने पर गर्व महसूस करना चाहिए।
प्रो. पांडे ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय उन्हें परस्पर पूरक रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने युवाओं से अपनी मातृभाषा सीखने और उसके संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान किया। उनके अनुसार भाषा को मजबूत बनाने के लिए उसके प्रयोक्ताओं को अधिक दक्ष, जागरूक और जिम्मेदार बनाने की जरूरत है।
कार्यक्रम का संचालन भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) दिनेश चंद्र चमोला ने किया। उन्होंने हिंदी के बदलते स्वरूप पर बात रखते हुए कहा कि हिंदी प्रयोगधर्मा भाषा है। समय के साथ हिंदी ने अपने आनंदमूलक स्वरूप से प्रयोजनमूलक स्वरूप की ओर कदम बढ़ाया है। इसके परिणामस्वरूप पाठकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए ज्ञान तथा रोजगार के नए अवसरों के द्वार खुले हैं। वैश्विक संदर्भ में हिंदी ने अपने बहुप्रयोजनीय स्वरूप को तलाशते हुए अपनी उपयोगिता भी साबित की है।
डॉ. चमोला ने ज्ञान और शोध के क्षेत्र में आत्मविश्लेषण को जरूरी बताते हुए कहा कि व्यक्ति को समय-समय पर यह विचार करना चाहिए कि उसके पास जो ज्ञान अथवा शोध की संपदा है, उसमें उसका अपना ठोस योगदान कितना है। यही आत्ममंथन भविष्य की ज्ञान परंपरा को मजबूत आधार दे सकता है।
व्याख्यान के अंत में सहायक आचार्य डॉ. अनूप बहुखंडी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। ऑनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में भगवान दास संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. भोला झा, डॉ. हरीश तिवारी, डॉ. आरती सैनी, डॉ. रुपेश शर्मा, स्वामी ऋषिकेश ब्रह्मचारी, श्रीलेखा, अनीता, दिव्यांशु, मीनाक्षी, सचिन, प्रियांशु, फातिमा, रश्मि समेत अन्य लोग उपस्थित रहे।

Picture of India Lakshya News

India Lakshya News

India Lakshya News एक विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ पोर्टल है, जिसका उद्देश्य देश और दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और तेज खबरें पाठकों तक पहुंचाना है।
Picture of India Lakshya News

India Lakshya News

India Lakshya News एक विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ पोर्टल है, जिसका उद्देश्य देश और दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और तेज खबरें पाठकों तक पहुंचाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement

Live Poll

Are You Satisfied India Lakshya News ?

Also Read This

Our Visitor

0 1 2 4 0 9
Users Today : 177
Users Yesterday : 147