हरिद्वार। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित संस्कृत सप्ताह महोत्सव का सोमवार को विविध सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों के साथ समापन हुआ। सप्ताहभर चले आयोजन में विद्यार्थियों ने संस्कृत भाषा के साथ भारतीय ज्ञान, संस्कृति, परंपरा और विरासत से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। विश्वविद्यालय स्तर और विभागीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में अभिषेक मंगाई ने प्रथम, वंदना शर्मा ने द्वितीय और मनीष रियाल ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता में वंदना शर्मा और गौरव जोशी संयुक्त रूप से प्रथम रहे। अभिषेक सेमल्टी द्वितीय और वेदांत सती तृतीय स्थान पर रहे।
अन्य प्रतियोगिताओं में भी विद्यार्थियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। व्याकरण में सुशील प्रथम और त्रिज्या द्वितीय, ज्योतिष में जगदीश पांडे प्रथम, साहित्य में शुभम नौटियाल प्रथम रहे। शिक्षा शास्त्र में गौरव जोशी और विशाल भट्ट द्वितीय रहे। हिंदी में दिव्यांशु जुयाल प्रथम और अनीता द्वितीय रहीं। पर्यावरण एवं इतिहास में अमन कुमार दुबे प्रथम और जगदीश चंद्र पांडे द्वितीय रहे। पत्रकारिता में हेमंत प्रथम और सोनी कुमार द्वितीय, अंग्रेजी में अभिषेक मंगाई प्रथम और सुशील द्वितीय रहे। श्रीमद्भगवद्गीता में मानसी वर्मा प्रथम और पीयूष मिश्रा द्वितीय रहे।
समापन समारोह में विजेता विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र और नगद पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। मुख्य संयोजक प्रो. दामोदर परंगाई ने बताया कि 25 अगस्त से आयोजित संस्कृत सप्ताह के दौरान विद्यार्थियों को संस्कृत के विभिन्न आयामों से जोड़ने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं।
कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय ने संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन में पूर्वजों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत को उत्तराखंड में द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलना भी लंबे संघर्ष और प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि 18वीं, 19वीं और 20वीं शताब्दी में संस्कृत के आचार्यों और कवियों ने नई रचनाधारा विकसित की। अंग्रेजी शासन के दौर में भी गुरुकुलों और संस्कृत शिक्षा की परंपरा को बचाए रखने के प्रयास हुए।
मुख्य अतिथि उत्तराखंड संस्कृत ओपन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने संस्कृत को भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारत की वैचारिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ियों तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त आईपीएस अनिल मिश्र, समाजसेवी देशराज सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद रहे।














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